Sunday, 2 April 2017

मैं नहीं पढता

मैं नहीं पढता अब
अपने नज्मों को
क्योंकि मुझे अब अपनी  नज्मों से
होती है उलझन
वो सारी धुंधली हो चुकी यादें
वो सारे ज़ख्म
फिर ताज़ा होने लगते है
वो नज़्म जो मैंने लिखी थी तुम्हारे लिए
तुम्हारी जुल्फों के लिए
अमौर के लिए
लेकिन अब यूं लगता है
कि तुम मेरे नज्मों के
लायेक ही नहीं हो
तुम मेरे लायेक नहीं हो
तुमने मुझे जो तकलीफ दी
वो मैं सह सकता हूँ
लेकिन तुमने मुझसे ज्यादा
मेरी नज्मों को
रूहानी तकलीफ से नवाज़ा है
तुमने मेरी नज्मों का मौज़ू
मुझसे छीना है
इसलिए
अब मैं नहीं पढता अपनी नज्मों को 

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