Sunday, 5 February 2017

तुम्हारी है तुम ही सम्भालों ये दुनिया

जहाँ वफ़ा कुछ नहीं
दोस्ती कुछ नहीं है
जहाँ आदमी की हस्ती कुछ नहीं है
जहाँ जिन्दों से ज्यादा
मुर्दों के है बस्ती
जहाँ जिस्म है
सिक्कों के झंकार पर बिकती
जहाँ हव्वा की हमजिंस
है इन्साफ को तरसती
जहाँ हमसाए है
तलाश की मौकापरस्ती
मुझे नहीं चाहिए ऐसी दुनिया
तुम्हारी है तुम्ही सम्भालों ये दुनिया

जहाँ अमीरों के दौलत
के खातिर गरीब मरते
जहाँ हर पीठ पर
उनके साए है खंजर भोंकते
जहाँ राधा की बेटी इस्मत है
सरे आम लुटती
जहाँ रिश्तों की कशमकश में है
दिल सारे झुलसे
मुझे नहीं चाहिए ऐसी दुनिया
तुम्हारी है तुम्ही सम्भालों ये दुनिया

जहाँ मज़हब की नाम पर 
चलती गई तैगें 
जहाँ इश्क पर है 
हर किसी के नज़रे 
जहाँ इश्क बदनाम है 
हर मोड़ पर 
जहाँ आदमी के इश्क को 
तौला जाये चांदी पर 
जहाँ सारे दिल तोडना चाहे 
रिश्ते सरे दिल के 
मुझे नहीं चाहिए ऐसी दुनिया
तुम्हारी है तुम्ही सम्भालों ये दुनिया 

जहाँ नींद आती 
खामोश सड़क पर 
जहाँ आँख खुलती है 
कब्रिस्तान पर 
जहाँ बिकती औरत 
नीलम होकर 
जहाँ सभी जीना चाहे 
दुसरे को मार कर 
मुझे नहीं चाहिए ऐसी दुनिया
तुम्हारी है तुम्ही सम्भालों ये दुनिया

(तैगें - तलवार
 इस्मत - इज्ज़त
हमजिंस - एक ही जिन्स  के  )

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