Saturday, 4 February 2017

ज़िन्दगी

शायद ज़िन्दगी के साथ
इतना ही सफ़र था
शायद इस सफ़र का
अंत कुछ ऐसे ही होना था
आज समझ आया
कि इंसान कितना मजबूर है
उस आशिक जितना मजबूर
जिसके सामने ही उसका इश्क
ख़त्म हो जाता है
और वो कुछ कर नहीं पाता
आज मेरी ज़िन्दगी भी
उसी इश्क के तरह है
अब शायद ये सफर ख़त्म हो जाए
लेकिन हवाओं में मैं रहूँगा हमेशा
उन लोगों के लिए
जो मुझे महसूस करना चाहते है
माँ, अमौर
पता नहीं कब ये सारे रिश्ते
ख़त्म हो जाए
लेकिन ये अफ़सोस रहेगा
कि कुछ कसर
बाकी रह गई
काफी सपने देखे थे
इस पागल ने वो अब पूरे नहीं हो पायेंगे
लेकिन कोई नहीं
उस पार की दुनिया में
सुना है की बहुत सुकून है
अब उस सुकून का इंतज़ार है 

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