Saturday, 4 February 2017

सफरनामा

ज़िन्दगी का सफ़र
यूं तो तभी शुरू हो गया
जब पहली बार सांस ली थी
माँ के गोद में खेला
तो इस सफ़र को
नया आयाम मिला
नया मुकाम मिला
सफ़र जब शुरू होता है
तो राहें हमेशा एक जैसी नहीं होती
कभी कभी रास्ता
बहुत तकलीफ देने वाला होता है
माँ के साथ सफ़र काट रहा था
कि अचानक एक दिन
सर्दियों के कहरे से
एक रौशनी निकली
मुझे याद है जब मैंने तुम्हे
पहली बार देखा
एक अल्हड़ नटखट मिजाज़ के साथ
तशरीफ़ पेश लायी
उस दिन तुमने काल जैकेट पहने हुए
सर से यूं हेलमेट उतारा
जो मैं आज तक भुला नहीं हूँ
धीरे धीरे तुमसे बात करनी चाही
चुपके से तुम्हे देखने की तमन्ना जागी
बातें की मुलाकातें की
मुझे आज भी याद है वो दिन
जब मैंने तुम्हे पहली बार
"अमौर" बुलाया था
डरते हुए झिझकते हुए
तुम्हारी आँखों में देखा था
जब तुमने मुझे अपना
एक अच्छा दोस्त कहा
सबसे ज्यादा ख़ुशी उसी दिन हुई
उस दिन जिंदा होने का
मायने समझ में आये
मुझे याद है जब मैंने
पहली बार तुमसे लड़ाई की थी
तुम्हे डांटने के बाद
जितना बुरा तुमको लगा था
उससे लाख गुना ज्यादा
उदास और ग़मगीन मैं हुआ था
जब भी तुम्हे देखता हूँ
मेरे ज़िन्दगी के सफ़र को
नए आयाम मिलते है
अब हमेशा तुम्हे अपना
सफरनामा सुनना चाहता हूँ
सफरनामा बांटना चाहता हूँ
तुम्हे अपने सफ़र में
हमसफ़र बनाना चाहता हूँ
क्या तुम मेरी हमसफ़र बनोगी ?
जानता हूँ तुम इस सवाल का जवाब
नहीं दोगी
मेरे लिए तुम्हारा जवाब ज़रूरी नहीं
बल्कि ये ज़रूरी है
कि ये सब जानने के बाद
आज भी तुम मेरे साथ हो
मेरे हर सफ़र में
एक दोस्त की तरह
अमौर
ये मेरा सफरनामा था
अब तक का
मैं अगला सफरनामा तब लिखूंगा
जब तुम मेरी हमसफ़र बन जाओगी

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