Monday, 6 February 2017

आँखे

अमौर
तुम्हारी भूरी आँखे
जीने का सबब है
तुम्हारी इन आँखों में
हमेशा से डूबा रहा
न कभी निकला
ना कभी निकलने की चाह है
लेकिन तुम्हारी आँखें
बहुत झूठी है
तुम्हारी इन बातों की तरह
बहुत दिलकश फरेब छिपा है
इन आँखों में
हमेशा यही आँखें
फंसा लेती है अपने जाल में
मैं निकलना चाहता हूँ
इस मायावी जाल से
लेकिन तुम्हारी आँखे
दलदल की तरह है
जितना बाहर निकलो
उतना अन्दर डूबते चले जाओ
अमौर
तुम्हारी बातें
मक्कार है
झूठी है
क्योंकि ये तुम्हारी आँखों को
झुठलाती है
फरेब करवाती है
ख़ास कर मुझसे
सारी चीजें छुपाती है
तुम्हारी बातें और आँखे
जितना ज्यादा मैं
इश्क करता हूँ तुम्हारी
आँखों और बातों से
उससे ज्यादा नफरत करता हूँ
क्योंकि ये दोनों
मुझसे बातें तो करती है
लेकिन हमेशा झूठ ही बोलती है

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