Monday, 16 January 2017

                                                                        यादें


आज अचानक गलती से
याद आई बचपन की
सभी को याद आती है
अपने गुज़रे हुए कल की
लेकिन पता नहीं क्यों
मेरा दिल और दिमाग
नहीं याद करना चाहता
अपने बीते लम्हे को
नहीं याद करना चाहता
पिता का गुज़र जाना
नहीं याद करना चाहता
बाजी का बिछड़ जाना
नहीं याद करना चाहता
ग़ुरबत का वो दौर
मेरा ज़ेहन उन यादों को खंगालना चाहता है
जो यादें अब धुंधली
हो चुकी है
हो सकता है उन यादों में
पापा के साथ बिठाये गए
कुछ हसीन पल हो
हो सकता है
बाजी के साथ हंसी ठिठोली हो
हो सकता है उन यादों में
मेरी मां की आखरी हंसी छुपी हो |

3 comments:

  1. Beautiful.keep waiting like this.ishan bhaia

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  3. हम ज्यादा बड़े तो नहीं हुए हैं. आपसे तो छोटे ही हैं, लेकिन बचपन की यादें तो बचपन की यादें होती हैं.

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