Friday, 30 December 2016

समझ का फर्क

             
तुम समझती क्यों नहीं
मैं क्यों तुम से करता हूँ बातें
क्यों अपनी बातें बताता हूँ तुम्हे
क्यों तुम्हारी आवाज़ सुनना
चाहता हूँ मैं सुबह ओ शाम
तुम्हारी आवाज़ सुनके लगता है
शायद अब इस संसार की
ज़रुरत ही नहीं
तुम्हारी आवाज़ सुन के
मेरी धड़कन थम सी जाती है
आसमान में चाँद बड़ा हो जाता है
स्लो मोशन में दुपट्टा उड़ने लगता है
शायद तुम्हे ये सारी बातें
फ़िल्मी लगे
लेकिन ये भी बहाना है
तुम से बात करने का ।

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