Tuesday, 24 January 2017

पता नहीं

पता नहीं अब क्या लिखूं
क्योंकि मेरी ग़ज़ल के अल्फाज़
अब मुझसे खफ़ा है
पता नहीं क्या लिखूं
क्योंकि मेरी प्रेरणा
अब मुझसे दूर है
मैंने लिखना शुरू किया था
तुम्हारे वजह से
क्योंकि मैं जब भी
तुमको देखता था
तो अल्फाज़
खुद ब खुद मेरे पास आते थे
आज जब तुम मेरे पास नहीं हो
तो यही अल्फाज़ मुझसे
दूर जाते है
जब तुम मुझे देखते थे
तब मैं सोचना शुरू करता था
तुम्हारी भूरी आँखों की
गहराई में डूब जाता था
जब आज तुमने मुझसे नज़रे फिरा ली है
तो मैं क्या सोचूं
किसके लिए लिखूं
किसके नाम लिखूं
पता नहीं क्या लिखूं
आज जब मैं शाम में
निकला
तो मैं जान बूझ के धीरे धीरे
तुम्हारे आगे चल रहा था
मेरे दिल में एक ही तमन्ना थी
एक बार रोक लो बस एक बार
लेकिन तुमने मुझे रोका नहीं
लेकिन हां
शुक्रिया
क्योंकि अब मुझे ज़िन्दगी भर अफ़सोस नहीं होगा
कि काश काश अगर मैं थोड़ी देर और रहता
तो तुम मुझे रोक लेते
लेकिन बस
अब तुम जहाँ रहो खुश रहना
ये सोच कर कि आज भी
कोई पागल
इसलिए खुश और जिंदा है
क्योंकि तुम खुश हो
लेकिन अब सच में
समझ नहीं आ रहा
क्या लिखूं ?

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