प्रेरणा स्रोत - १
उस रात हाँ उस रात
मैं चला जा रहा था
तनहा, अकेला
पता नहीं किस अनजानी मंजिल की ओर
रास्ता आगे चलकर
और दुर्गम हो गया
पर पता नहीं कब
तुमने मेरा हाथ थामा
और मुझे उस पार किया
तुम मेरे ज़िन्दगी में रौशनी जैसी आई
पर जब मेरे ज़िन्दगी से गयी तो
चारो ओर अँधेरा कर के चली गयी
और आज मैं
फिर से निकल चूका हूँ
उसी राह की ओर
इसी उम्मीद में की तुम
मेरा हाथ फिर थामोगी ....
उस रात हाँ उस रात
मैं चला जा रहा था
तनहा, अकेला
पता नहीं किस अनजानी मंजिल की ओर
रास्ता आगे चलकर
और दुर्गम हो गया
पर पता नहीं कब
तुमने मेरा हाथ थामा
और मुझे उस पार किया
तुम मेरे ज़िन्दगी में रौशनी जैसी आई
पर जब मेरे ज़िन्दगी से गयी तो
चारो ओर अँधेरा कर के चली गयी
और आज मैं
फिर से निकल चूका हूँ
उसी राह की ओर
इसी उम्मीद में की तुम
मेरा हाथ फिर थामोगी ....
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