Tuesday, 27 December 2016

                                                              ख्वाहिश का टुकड़ा 

आज मन ही मन ऐसा महसूस हो रहा है 
जैसे मेरी आत्मा 
अन्दर से खोखली हो चुकी है 
एक ख्वाहिश थी मन में, वो 
टूट चुकी है, दब चुकी है
लेकिन उस ख्वाहिश के ख़त्म 
हो जाने के बावजूद 
शायद उस ख्वाहिश का छोटा सा हिस्सा
मेरे अन्दर अब भी मौजूद है 
लेकिन मेरे अन्दर 
अब इतनी हिम्मत बाकि नहीं 
कि उस ख्वाहिश के हिस्से को
और बिखरता हुआ देख सकूं 
अब तो बस एक ही दुआ है 
कि ज़िन्दगी भर उस ख्वाहिश का हिस्सा 
मेरे अन्दर रहे 
और उस हिस्से को अपने मन में 
सजों कर सारी ज़िन्दगी बसर कर लूं 
इस उम्मीद में कि वो ख्वाहिश 
फिर से जिंदा हो उठे  

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